Sunday, August 5, 2012

Are we ready for change?

India has been a silent victim of corruption for so long that we Indians have developed a mindset of accepting it as second nature to our way of living & survival in general, if I may call that.

Where we were?
With Anna's hunger taking center-stage last year, there was a glimmer of hope on the horizon. Expectations soared, people wanted to believe there is a storm coming...which would ultimately usher in a sea change in the way we saw and related to the realities of our life. Emotions ran high, tempting people to get on the road...literally speaking, shouting at the top of their voices, hope fueling this surge of emotions - hope of change for a better future. All of this culminated in the Lokpal bill being tabled & "discussed" in Indian Parliament...the Dance of Democracy was played out.

Where we are?
One year on and the govt. hasn't delivered on its promise (as was predicted) of implementing this bill, citing ridiculous reasons if any that is. But one of the good things of Indian Against Corruption(IAC)'s last year's "showdown" was that an baseline of expectation was set for & by the people of how their country should provide for them. This expectation fueled another round of fasting by Anna Hazare & Arvind Kejriwal along with others in Delhi which was called off couple of days ago.

IAC channelized, if not mobilized, thousands of people who wanted to participate & contribute in this agitation against corruption. Evidently govt dictated a media black-out on the coverage of this event to curtail the movement and with no dialog/engagement of any sort coming from the govt's end, the fast was called off. Not without an announcement of finding an political alternative to resolve the current state-of-affairs. Govt's learning from our neighboring country China on how-to stifle discontent worked well I must conclude!
Reason I say that was, as part of IAC's call, I was part of the Human Chain formation, in the early morning of 3rd August 2012 @ a busy road junction in Bangalore. To my utter surprise, apart from a handful of 20 odd people, none of the other general public ever bothered to wait and understand the importance of what was going on around them...no curious looks either!! They went around their business-as-usual!

So my point being, to start with this is & has been an Citizen movement, which is both good & bad. Good because we've a billion+ of them. Bad because only a fraction of those seem to be concerned with the current state-of-affairs & came out in support. Though I'm sure all of them without exception want a change for the better.


Are we ready for change?
So that is the big question that I want to ask and ultimately understand. I'm sure all of us would be eager to answer that in affirmative. But the plain bitter truth being if we aren't ready to participate in these kind of movements let alone be a flag-bearer for one, we better bid our goodbyes to our dream of a better country. In spite of all the hungama around how corrupt politicians and their corrupt ways are ruining our lives we hardly seem to want to bring an end to that by demanding change. Because that would mean we've to bring about a change in our ways of living and that is something we are not ready to do! We don't need to undertake any drastic & herculean task like letting go of families and dedicate all our energies to fighting corruption. No! No heroics required. All we need to do is make a systematic but progressive change in the way we perceive & go about life around us. Systematic as in ensuring we exercise our votes regularly as and when called upon. Participate in local community based issues & explore possible solutions. Remember if everyone took one small at-a-time, this movement gains enough momentum to sustain on...Now that is progressive thinking!

So now let me ask this again, are we game to shifting that attitudes of ours? Are we really ready for change?
Think India Think!


Amen!

7 comments:

  1. एक और अनशन ख़तम हुवा और इस तरह से एक नयी सोच और ऊर्जा देने का वायदा कर के लोग अपने अपने घर चले गए . आश्चर्य तो तब हुवा जब किसी ने भी अनशन पे बैठे हुवे लोगो का हाल तक नहीं पुछा बस एक बहस शुरू हो गयी चारों तरफ.
    तो कई सवाल उठे हैं इस आन्दोलन के कार्यकर्ताओं पे . मेरे कुछ सवाल हैं जनता से , खुद से . जनता का क्या रूख रहा है इस पूरे प्रकरण के दौरान ? क्या मिला आखिर में ?
    अगस्त २०११ , रामलीला मैदान में जो कुछ हुवा उसमे लाखों लोगो ने बढ़ चढ़ के भाग लिया. जनता जैसे इंतज़ार कर रही थी किसी ऐसे मौके का , की कोई आये और हमारी उंगली पकड़ के हमें रास्ता दिखाये . अन्ना , अरविन्द , किरण जैसे कुछ नाम देश भर में chaa गए . . लेकिन जो राजनीती समझता है भीड़ की , वोह समझ गया था की ये भीड़ जायदा देर टिकने वाली नहीं हैं. क्यूंकि ये भीड़ आज एक विचार से आंदोलित है लेकिन यह भीड़ और उसमे के लाखों लोग middle क्लास के लोग हैं जो सिर्फ अनुशाशन में रह कर टैक्स देते हैं.
    ये भीड़ किसानो की नहीं है जो वोट देते हैं .
    यह भीड़ मजदूरों के नही है जो वोट देते हैं.
    ये भीड़ उन लोगो की है जो गुस्सा हैं और एक विचार - लोकपाल - को ले के मंत्रमुग्ध हैं. इन्हें बारीकियां नहीं मालूम , लेकिन ये बस चाहतें हैं की सरकार के कुछ लोगो को सजा मिले .
    वोह ये सपना जब जब देखते , तब रोमांटिक हो जाते और पूरे जोश की साथ नारे लगाये जाते हैं .
    सरकार के भीड़ विशेश्यग ने व्वायदे कर के सबको घर लौटा दिया . वोह ये देखना चाहते थे की ये लोग कितने देर तक अपने गुस्से पे टिक पाएंगे .

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    1. Well said my friend! These corrupt politicians are even ready to go as far as to consult & engage "experts" who are well-versed in analyzing the dynamics of mob behavior and their outcomes.
      Thanks for taking time to add your valuable inputs here.

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  3. फिर आन्दोलन के संचारकों पे आरोप प्रत्य रोप का दौर चला . ये सिर्फ उन ४-५ लोगो के इम्तेहान नहीं था , जबकि सत्ता ये देखना चाहती थी की जो लाखो लोग एक साथ नारे लगा रहे थे वोह अपने इन ४-५ लोगो पे अभी भी विश्वास बना पाएंगे या नहीं . जान बूज के २-३ महीने का टाइम खरीद लिया. और यहीं उस जनता ने घुटने टेक दिए .
    मुंबई में जब बुलावा आया , तो उत्सह कम हो गया था . लोगो के मन में अब बहस लोकपाल या सरकार का निकम्मापन न हो के इस बात पे शुरू हो गया के आखिर में ये ४-५ लोग कौन है ? इनके क्या साख है ? . अर्त्ताथ , जनता ने जिन्हें पहले आनन फानन में , बिना कुछ विशेष सवाल किये अपना लीडर मान लिया , अब उसी को संशय के द्रष्टि से देख रही थी . और येही सत्ता धारियों का खेल था जिसमे उन्हों ने जीत हासील कर ली थी .
    दिसम्बर २०११ के आखिरी हफ्ते में पूरे उत्साह के साथ , लोकतंत्र के मंदिर में , लोकपाल बिल को राज्य सभा में लाया गया , फाड़ा गया , उछाला गया और उसी जनता के मूंह पे एक तमाचा लगा के दरवाजे बंद कर दिए गए और कह दिया गया की अब हमने तुम्हारी शक्ति देख ली, हिम्मत है तो जवाब दो .अगर ये आन्दोलन वाकई मजबूत होता तो जनता अगले दिन ही सडको में होने चाहिए थी मगर ये नहीं हुवा क्यूंकि सब इंतज़ार कर रहे थे की कोई आयेगा और फिर हमें ले के जायेगा .जो दीवाने अनशन कर रहे थे , वोह तो बीमार हो के जा चुके थे .
    वोह लोग जो अगस्त में भीड़ में आये थे बजाय इसके की खुद कुछ करें , सारा जिम्मेदारी ४-५ लोगो पे dhaal दी और तमाशा देखने के लिए टीवी के सामने बैठ गए .
    जुलाई २०१२ के आखिरे हफ्ते में फिर जनता को बुलावा गया . इस बार तो बचे खुचे सैनिको ने भी हतिय्यर दाल दिए थे . सिर्फ कुछ पागल लोग अनशन पे बैठ गए .
    जनता ने फिर सत्ता का paksh लिया और शांत रही .
    जब एक ७५ साल के बुजुर्ग ने हुनकार लगाई और कहा के अब मैं भी जान लड़ा दूंगा , तब हरकत हुयी . लेकिन फिर भी वोह जोश और उन्माद नहीं था .
    ये लडाई जो सबके भलाई के लिए थी , सिर्फ कुछ ही लोगो के बीच की हो कर रह गयी और सत्ता पक्ष ने फिर से जनता को औकात देखा दी.
    जब तक कोई सामने नहीं आया था , हम लोग खुसुर फुसुर कर के , चाय की दूकानों में , ऑफिस में , बसों में , ट्रेन में खूब गरियाते थे , और जब कुछ सहाशी लोगो के साथ जूड के कुछ करने का वक़्त आया तो अपनी ही दोहरी मानसिकता में उलझ कर ये मौका गँवा दिया.
    खैर , अब वही सत्ता पक्ष मुस्करा रहे हैं के अब तो चुनाव में भी हराएंगे जिससे आने वाले १० - २० सालों में कोई इस तरह की जुर्ररत न कर सके . वोह ऐसा सोच सकते हैं क्यूंकि उनको मालूम है के जनता आपने उन्माद पे टिकने वाली नहीं हैं .
    ये पागल लोग जब सर पे कफ़न बाँध के , हांथों में तिरंगा ले के और दिल में एक नयी सोच का जज्ज्बा ले के चुनाव लड़ने आएंगे तब उन्हें सामान करना पड़ेगा जात पात के समिकारों का, सामना करना पड़ेगा गुंडागर्दी का , सामना करना पड़ेगा ऐसे सहरी इलाकों में रहेने वाले लोगो से जो हताश हैं , परेशां हैं लेकिन जब वोट देने की बरी आयेगी तो मूंह मोड़ लेंगे.
    तो समय आ गया है के सिर्फ कुछ लोगो की निंदा और आलोचना के बजाये , जनता को , हर एक उस आदमी को, जो इस तंत्र से दुखी है , ये सोचना चाहिए और साथ देना चाहिए . सिर्फ भावना में बह कर किसी को समर्थन न दें . सोच विचार के साथ आयें और अगर संसय हो तो मत आयें .क्यूंकि इस आन्दोलन को सिर्फ ४-५ लोगकी जरूरत नहीं हैं , यह हमारी , आम जनता की लड़ाई है और जिम्मेदारी भी हैं .

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    1. Well said my friend! In fact politicians these days have the nerve to openly mock & snide people who try to raise their voices against their corrupt practices.
      Allegations against Team Anna members is well known to all! I also agree with your point-of-view of urban class of not casting their votes when called upon. Voting - which is the quintessential tool for democracy is not used as it should be. Time has come for all (urban/rural) voters to register themselves and then cast their valuable votes during elections. You choose the people you want to make choices for how you live. The power is with You!

      More details for Karnataka based voters can be found by visiting http://www.voterreg.kar.nic.in/

      Thanks for taking time to add your valuable inputs here.

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